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Sunday, May 17, 2020

रोटी और ट्रेन के इंतजार में टूटने लगा सब्र, सुबह लाइन में लगने और रात काे भूखे साेने की मजबूरी

लाॅकडाउन के कारण बेघर हाे गए श्रमिक खाने के लिए समाज सेवी संस्थाओं पर निर्भर हैं। ट्रेन के इंतजार में दिनभर लाइनाें में लगने वाले श्रमिकाें काे कतई जानकारी नहीं हाेती कि रात काे खाना मिलेगा या भूखे पेट ही साेना पड़ेगा। बिहार के रहने वाले 30 साल के रमेश 6 दिन से परिवार के साथ फुटपाथ के किनारे सो कर रात बिता रहे हैं।

भास्कर काे आपबीती सुनाते बाेले, किराया न दे पाने पर मकान मालिक ने घर से निकाल दिया। परिवार के साथ गांव जाने के लिए यहां बैठे हैं। 6 दिन से ट्रेन का इंतजार है। गाड़ी नहीं मिल रही पुलिस के डंडे जरूर खाने पड़ रहे हैं। 6 दिन से ठीक से साे भी नहीं पाए। रमेश अकेले प्रवासी मजदूर नहीं हैं जो इस तरह पठानकोट चौक के पास बने फुटपाथ पर अपनी बारी के इंतजार में सड़क पर ही रात बिता रहे हैं। उनकी तरह कई मजदूर इसी तरह परेशानी झेल रहे हैं।

प्रशासन ने सड़कों पर लाकर छोड़ दिया

झारखंड के रहने वाले राम प्रसाद ने कहा ट्रेन में जाने के लिए मेडिकल का मैसेज आया था ताे परिवार को साथ लेकर आ गया। अभी तक बारी नहीं आई। हम लोग कभी-कभी, एनजीओ द्वारा खाना खा रहे हैं और कई बार खाली पेट सोते हैं। रोटी और ट्रेन के इंतजार में मजदूरों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। प्रशासन की ओर से सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। ट्रेन में जाने के लिए बुला कर उन्हें सड़कों पर लाकर छोड़ दिया है। विभिन्न राज्यों में फंसे हुए मजदूरों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई हैं, लेकिन इस सफर के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने में प्रवासी श्रमिकों को काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। हाल यह है कि रजिस्ट्रेशन करने के 10 दिन बाद भी वापसी नहीं हो पा रही। यही कारण है कि प्रवासी श्रमिक ट्रेन में बारी आने का इंतजार किए बिना पैदल या साइकिल से अपने गांव-घर की ओर चलने के बारे में सोच रहे हैं।

रजिस्ट्रेशन के 7 दिन बाद भी नहीं मिली ट्रेन फाेन बेचना चाहा, वाे भी पुलिस के डंडे से टूट गया

बिहार जाने वाले सोनेलाल, कल्लू, तुलसी ने बताया कि करीब 7 दिन पहले उन्होंने ट्रेन की बुकिंग करवाई थी। 7 दिन से वह पठानकोट चौक के पास आते हैं और अपनी बारी का इंतजार करने के बाद निराश हाेकर क्वार्टर लौट जाते थे। 2 दिन पहले उनके मकान मालिक ने उन्हें घर से निकाल दिया क्योंकि उनके पास किराया नहीं था। ट्रेन में जगह नहीं मिली ताे पैदल जाने का फैसला किया। सोनेलाल ने बताया कि उनकी जेब में एक रुपया तक नहीं है। सुबह पुलिस ने लाठीचार्ज किया ताे फोन टूट गया और हाथ में गहरी चोट आई। पैसे खत्म हाेने पर फाेन का सहारा था। साेचा था कि फोन बेचकर रास्ते में गुजर-बसर कर लेंगे पर वाे भी टूट गया। पंजाब ने उन्हें जीने का तरीका सिखाया है। अब दाेबारा नहीं लौटेंगे।



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जब घंटों लाइन लगाने के बाद भी मजदूर ट्रेन में नहीं बैठ पाए तो थककर कबाड़ कार पर ही सो गए।

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May 17, 2020 at 05:00AM

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